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When We Are Not On The Same Page | Relationship Philosophy

When We Are Not on the Same Page रिश्ते टूटते नहीं, कभी-कभी बस अलग-अलग पन्नों पर चले जाते हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि लोग बदल जाते हैं। लेकिन शायद सच यह नहीं है। शायद दो लोग एक-दूसरे से प्यार करते हुए भी अलग-अलग अध्यायों में पहुँच जाते हैं। एक अभी भी "Healing" के पन्ने पर होता है। दूसरा "Responsibilities" के अध्याय में खो जाता है। एक उत्तर ढूँढ़ रहा होता है। दूसरा समाधान। एक बात करना चाहता है। दूसरा सही समय का इंतज़ार। दोनों गलत नहीं होते। दोनों बस... एक ही किताब के अलग-अलग पन्नों पर होते हैं। यहीं से दूरी पैदा होती है। कोई किसी से कम प्यार नहीं करता। लेकिन कोई किसी को समझ नहीं पाता। क्योंकि समझने के लिए एक ही पन्ने पर होना ज़रूरी है। हम अक्सर सामने वाले के व्यवहार को उसका स्वभाव मान लेते हैं। जबकि कई बार वह उसके वर्तमान अध्याय का असर होता है। जिसे बचपन में असुरक्षा मिली हो, वह भरोसे का अध्याय देर से पढ़ता है। जिस पर जिम्मेदारियाँ जल्दी आ गई हों, वह प्रेम के पन्ने जल्दी बंद कर देता है। जिसने खोया हो, वह पकड़कर रखना सीखता है। जिसने अकेलापन चुना हो, वह चुप रहना सीख जात...

आखिर क्यों ....हम ही बुरे बन जाते हैं?

जिसकी गलतीयों को हम  नादान समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं,  वही हमें गुनहगार मान बैठता है ...  जब दिल में जो आया बोल देता है..  खामोशी को आपकी कमजोरी समझता है..  जाने कितनी बार चोट दे जाता है..  लेकिन गलती तो बेशक अपनी ही होती है..  हम रिश्ते का लिहाज रखते जाते हैं..  जिल्लत भी सहते जाते हैं..  कुछ न कर के भी बुरे बन जाते हैं!  क्योंकि,  हर शख़्स बस खुद को जानता है किसी को समझना नही चाहता..  जानता है तो बस परखना!  ✍️अनुपमा

दो तरह से टूटता है विश्वास

दो तरह से टूटता है विश्वास एक तो शख़्स तोड़ देता है दूसरा शक़ तोड़ देता है! 

यूँ ही किसी दिन...

यूँ ही किसी दिन....  यूँ ही किसी दिन पलकों पर  ख्वाबों का बसेरा होगा फिर किसी रात यही ख़्वाब  बरसने लगेंगे आँखों से कुछ खिले-खिले फूल यादों के दिल कि बगियाँ के मुस्काएंगे कुछ मुरझाकर झड़ जाएंगे  शायद...कुछ हद तक..  क्यूँ कि हर एक पल  बदलता रहता हैं वक़्त....  तो वक़्त को रोकने वाले  हम कौन होते हैं..?  हमें तो चलते जाना है..  बस चलते जाना है...!  _ अनुपमा✍️

कितना कुछ..

कितना कुछ !  बरसों बित गए, पिछे छूट गया, कितना कुछ !  फिर भी...साथ लेकर चल दिए, कितना कुछ !  कह दिया करते है, हम अक्सर दिल की बातों को कहना चाहा भी, दिल में रख लिए, कितना कुछ? सब रब की मर्जी...... सही गलत में उलझते नहीं  उफ्फ तक नहीं करते, सह लिए.... कितना कुछ? गलतफहमियां रखते है लोग, सुनना चाहते नहीं शायद हम भी समझे नहीं अब तलक कितना कुछ?                                ✍️अनुपमा