कितना कुछ..

कितना कुछ ! 

बरसों बित गए, पिछे छूट गया, कितना कुछ ! 
फिर भी...साथ लेकर चल दिए, कितना कुछ ! 

कह दिया करते है, हम अक्सर दिल की बातों को
कहना चाहा भी, दिल में रख लिए, कितना कुछ?

सब रब की मर्जी...... सही गलत में उलझते नहीं 
उफ्फ तक नहीं करते, सह लिए.... कितना कुछ?

गलतफहमियां रखते है लोग, सुनना चाहते नहीं
शायद हम भी समझे नहीं अब तलक कितना कुछ?
                              
✍️अनुपमा

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

When We Are Not On The Same Page | Relationship Philosophy

यूँ ही किसी दिन...